दिन 122 / 126
Mokṣa Sannyāsa Yoga
मोक्ष सन्न्यास योग · अध्याय 18:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 18.54–18.58
सस्वर पाठ
पढ़ें · 18.54–18.58
5 श्लोक · अनुवाद
मनन
यह सारा भार अकेले ढोना छोड़ देना कैसा लगेगा?
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्
॥ १८.५४ ॥
फिर वह सच्चिदानन्दधन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसी के लिये शोक करता है और न किसी की आकाङ्क्षा ही करता है। ऐसा समस्त प्राणियों में समभाव वाला योगी मेरी परा भक्ति को प्राप्त हो जाता है।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है