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Mokṣa Sannyāsa Yoga

मोक्ष सन्न्यास योग · अध्याय 18:

आज की लय

सुनें · 18.54–18.58
सस्वर पाठ
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5 श्लोक · अनुवाद
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मनन

यह सारा भार अकेले ढोना छोड़ देना कैसा लगेगा?

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति

समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्

॥ १८.५४ ॥

फिर वह सच्चिदानन्दधन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसी के लिये शोक करता है और न किसी की आकाङ्क्षा ही करता है। ऐसा समस्त प्राणियों में समभाव वाला योगी मेरी परा भक्ति को प्राप्त हो जाता है।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है