दिन 120 / 126
Mokṣa Sannyāsa Yoga
मोक्ष सन्न्यास योग · अध्याय 18:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 18.43–18.48
सस्वर पाठ
पढ़ें · 18.43–18.48
6 श्लोक · अनुवाद
मनन
यह सारा भार अकेले ढोना छोड़ देना कैसा लगेगा?
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्
॥ १८.४३ ॥
शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव—ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है