दिन 12 / 126

Sāṅkhya Yoga

साङ्ख्य योग · अध्याय 2:

आज की लय

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6 श्लोक · अनुवाद
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मनन

मैं कहाँ उस वस्तु के लिए शोक कर रहा हूँ जो कभी नष्ट नहीं होती?

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्

उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते

॥ २.१९ ॥

जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मारा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी के द्वारा मारा जाता है।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है