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Mokṣa Sannyāsa Yoga

मोक्ष सन्न्यास योग · अध्याय 18:

आज की लय

सुनें · 18.37–18.42
सस्वर पाठ
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पढ़ें · 18.37–18.42
6 श्लोक · अनुवाद
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मनन

यह सारा भार अकेले ढोना छोड़ देना कैसा लगेगा?

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्

तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्

॥ १८.३७ ॥

हे भरत श्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अन्त को प्राप्त हो जाता है—॥ ३६॥ जो ऐसा सुख है, वह आरम्भकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है; इसलिये वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है।

श्लोक 36–37

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है