दिन 11 / 126
Sāṅkhya Yoga
साङ्ख्य योग · अध्याय 2:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 2.13–2.18
सस्वर पाठ
पढ़ें · 2.13–2.18
6 श्लोक · अनुवाद
मनन
मैं कहाँ उस वस्तु के लिए शोक कर रहा हूँ जो कभी नष्ट नहीं होती?
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति
॥ २.१३ ॥
जैसे जीवात्मा की इस देह में बालक पन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है; उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है