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Sāṅkhya Yoga

साङ्ख्य योग · अध्याय 2:

आज की लय

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6 श्लोक · अनुवाद
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मनन

मैं कहाँ उस वस्तु के लिए शोक कर रहा हूँ जो कभी नष्ट नहीं होती?

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा

तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति

॥ २.१३ ॥

जैसे जीवात्मा की इस देह में बालक पन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है; उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है