दिन 108 / 126

Śraddhātraya Vibhāga Yoga

श्रद्धात्रय विभाग योग · अध्याय 17:

आज की लय

सुनें · 17.1–17.6
सस्वर पाठ
▶
पढ़ें · 17.1–17.6
6 श्लोक · अनुवाद
→
मनन

क्या मेरी छोटी-छोटी दैनिक आदतें उस व्यक्ति को गढ़ रही हैं, जो मैं बनना चाहता हूँ?

अर्जुन उवाचये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः

तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः

॥ १७.१ ॥

अर्जुन बोले-हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्रविधि को त्यागकर श्रद्धा से युक्त हुए देवादिका पूजन करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी किंवा तामसी?

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है