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Daivāsura Sampad Vibhāga Yoga
दैवासुर सम्पद् विभाग योग · अध्याय 16:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 16.7–16.12
सस्वर पाठ
पढ़ें · 16.7–16.12
6 श्लोक · अनुवाद
मनन
आज मैं किस वृत्ति को पोषित कर रहा हूँ — उदार वाली को, या लोभी वाली को?
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते
॥ १६.७ ॥
आसुरी स्वभाव वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति—इन दोनों को ही नहीं जानते। इसलिये उनमें न तो बाहर-भीतर की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्यभाषण ही है।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है