दिन 105 / 126

Daivāsura Sampad Vibhāga Yoga

दैवासुर सम्पद् विभाग योग · अध्याय 16:

आज की लय

सुनें · 16.7–16.12
सस्वर पाठ
▶
पढ़ें · 16.7–16.12
6 श्लोक · अनुवाद
→
मनन

आज मैं किस वृत्ति को पोषित कर रहा हूँ — उदार वाली को, या लोभी वाली को?

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः

न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते

॥ १६.७ ॥

आसुरी स्वभाव वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति—इन दोनों को ही नहीं जानते। इसलिये उनमें न तो बाहर-भीतर की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्यभाषण ही है।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है