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Daivāsura Sampad Vibhāga Yoga
दैवासुर सम्पद् विभाग योग · अध्याय 16:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 16.1–16.6
सस्वर पाठ
पढ़ें · 16.1–16.6
6 श्लोक · अनुवाद
मनन
आज मैं किस वृत्ति को पोषित कर रहा हूँ — उदार वाली को, या लोभी वाली को?
श्री भगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्
॥ १६.१ ॥
श्रीभगवान् बोले—भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिये ध्यान योग में निरन्तर दृढ स्थिति और सात्त्विक दान, इन्द्रियों का दमन, भगवान्, देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान् के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्मपालन के लिये कष्ट सहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अन्तःकरण की सरलता,।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है