दिन 10 / 126
Sāṅkhya Yoga
साङ्ख्य योग · अध्याय 2:
कर्म
भक्ति
ज्ञान
आज की लय
सुनें · 2.7–2.12
सस्वर पाठ
पढ़ें · 2.7–2.12
6 श्लोक · अनुवाद
मनन
मैं कहाँ उस वस्तु के लिए शोक कर रहा हूँ जो कभी नष्ट नहीं होती?
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्
॥ २.७ ॥
इसलिये कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याण कारक हो, वह मेरे लिये कहिये; क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिये आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिये।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है