दिन 7 / 7

Bhakti Yoga

भक्ति योग · अध्याय 12:

आज की लय

सुनें · 12.13–12.14
सस्वर पाठ
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2 श्लोक · अनुवाद
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मनन

किसके प्रति मैं थोड़ा कोमल हो सकता हूँ, और दिन का सामना थोड़ी और समता से कर सकता हूँ?

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च

निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी

॥ १२.१३ ॥

जो पुरुष सब भूतों में द्वेषभाव से रहित, स्वार्थरहित, सबका प्रेमी और हेतु रहित दयालु है तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख-दुःखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करने वाले को भी अभय देने वाला है; तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किये हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चय वाला है—वह मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धि वाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है।

श्लोक 13–14

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है