दिन 5 / 7
Sāṅkhya Yoga
साङ्ख्य योग · अध्याय 2:
आज की लय
सुनें · 2.70–2.71
सस्वर पाठ
पढ़ें · 2.70–2.71
2 श्लोक · अनुवाद
मनन
यदि मैं किसी इच्छा को अपने भीतर से बस बह जाने दूँ, जैसे नदी समुद्र में — तो कैसा हो?
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी
॥ २.७० ॥
जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले, समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किये बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है