दिन 3 / 7

Sāṅkhya Yoga

साङ्ख्य योग · अध्याय 2:

आज की लय

सुनें · 2.56–2.57
सस्वर पाठ
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2 श्लोक · अनुवाद
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मनन

मैं सुख के क्षणों में कहाँ जकड़ लेता हूँ और कठिन क्षणों के विरुद्ध कहाँ अकड़ जाता हूँ?

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः

वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते

॥ २.५६ ॥

दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्देग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, ऐसा मुनि स्थिर बुद्धि कहा जाता है।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है