दिन 1 / 7
Sāṅkhya Yoga
साङ्ख्य योग · अध्याय 2:
आज की लय
सुनें · 2.14–2.15
सस्वर पाठ
पढ़ें · 2.14–2.15
2 श्लोक · अनुवाद
मनन
किस क्षणिक असुविधा को मैं स्थायी मान बैठा हूँ?
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत
॥ २.१४ ॥
हे कुन्तीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख — दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति, विनाशशील और अनित्य हैं; इसलिये हे भारत! उनको तू सहन कर।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है