दिन 7 / 18

Jñāna Vijñāna Yoga

ज्ञान विज्ञान योग · अध्याय 7:

आज की लय

सुनें · 7.1–7.30
सस्वर पाठ
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30 श्लोक · अनुवाद
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मनन

ऐसा क्या है जिसे मैं शब्दों में समझता हूँ, पर अब तक जिया नहीं?

श्री भगवानुवाच

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः

असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु

॥ ७.१ ॥

श्रीभगवान् बोले—हे पार्थ! अनन्य प्रेम से मुझ में आसक्त चित्त तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादि गुणों से युक्त, सबके आत्मरूप मुझको संशयरहित जानेगा, उसको सुन।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है