दिन 6 / 18

Dhyāna Yoga

ध्यान योग · अध्याय 6:

आज की लय

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सस्वर पाठ
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47 श्लोक · अनुवाद
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मनन

जब मन भटक जाता है, तब मैं उसे कितनी कोमलता से वापस ले आ सकता हूँ?

श्री भगवानुवाच

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः

स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः

॥ ६.१ ॥

श्रीभगवान् बोले— जो पुरुष कर्म फल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है।

अनुवाद

आज पूरा करने से आपका दीया जलता है