दिन 2 / 18
Sāṅkhya Yoga
साङ्ख्य योग · अध्याय 2:
आज की लय
सुनें · 2.1–2.72
सस्वर पाठ
पढ़ें · 2.1–2.72
72 श्लोक · अनुवाद
मनन
मैं कहाँ उस वस्तु के लिए शोक कर रहा हूँ जो कभी नष्ट नहीं होती?
सञ्जय उवाच
तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः
॥ २.१ ॥
सञ्जय बोले—उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान् मधुसूदन ने यह वचन कहा।
अनुवाद
आज पूरा करने से आपका दीया जलता है