अध्याय 18 · प्रवाह में पढ़ें

मोक्ष सन्न्यास योग

Mokṣa Sannyāsa Yoga · मोक्षसंन्यासयोग

अर्जुन उवाच

संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्

त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन

arjuna uvāca

saṃnyāsasya mahābāho tattvamicchāmi veditum|

tyāgasya ca hṛṣīkeśa pṛthakkeśiniṣūdana||

अर्जुन बोले—हे महाबाहो! हे अन्तर्यामिन्! हे वासुदेव! मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को पृथक्-पृथक् जानना चाहता हूँ।

श्री भगवानुवाच

काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः

सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः

śrī bhagavānuvāca

kāmyānāṃ karmaṇāṃ nyāsaṃ saṃnyāsaṃ kavayo viduḥ|

sarvakarmaphalatyāgaṃ prāhustyāgaṃ vicakṣaṇāḥ||

श्रीभगवान् बोले -कितने ही पण्डितजन तो काम्यकर्मों के त्याग को संन्यास समझते हैं तथा दूसरे विचार कुशल पुरुष सब कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं।

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे

tyājyaṃ doṣavadityeke karma prāhurmanīṣiṇaḥ|

yajñadānatapaḥkarma na tyājyamiti cāpare||

कई एक विद्वान् ऐसा कहते हैं कि कर्ममात्र दोष युक्त हैं, इसलिये त्यागने के योग्य हैं और दूसरे विद्वान् यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने योग्य नहीं है।

निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम

त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः

niścayaṃ śrṛṇu me tatra tyāge bharatasattama|tyāgo hi puruṣavyāghra trividhaḥ saṃprakīrtitaḥ||

हे पुरुष श्रेष्ठ अर्जुन! संन्यास और त्याग, इन दोनों में से पहले त्याग के विषय में मेरा निश्चय सुन। क्योंकि त्याग सात्त्विक, राजस और तामस भेद से तीन प्रकार का कहा गया है।

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्

यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्

yajñadānatapaḥkarma na tyājyaṃ kāryameva tat|yajño dānaṃ tapaścaiva pāvanāni manīṣiṇām||

यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याग करने के योग्य नहीं है, बल्कि वह तो अवश्य कर्तव्य है, क्योंकि यज्ञ, दान और तप-ये तीनों ही कर्म बुद्धिमान् पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं।

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च

कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्

etānyapi tu karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā phalāni ca|kartavyānīti me pārtha niścitaṃ matamuttamam||

इसलिये हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिये; यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है।

नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते

मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः

niyatasya tu saṃnyāsaḥ karmaṇo nopapadyate|mohāttasya parityāgastāmasaḥ parikīrtitaḥ||

(निषिद्ध और काम्य कर्मों का तो स्वरूप से त्याग करना उचित ही है) परंतु नियत कर्म का स्वरूप से त्याग उचित नहीं है। इसलिये मोह के कारण उसका त्याग कर देना तामस त्याग कहा गया है।

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्

स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्

duḥkhamityeva yatkarma kāyakleśabhayāttyajet|sa kṛtvā rājasaṃ tyāgaṃ naiva tyāgaphalaṃ labhet||

जो कुछ कर्म है वह सब दुःख रूप ही है-ऐसा समझकर यदि कोई शारीरिक क्लेश के भय से कर्तव्य-कर्मों का त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग करके त्याग के फल को किसी प्रकार भी नहीं पाता।

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन

सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः

kāryamityeva yatkarma niyataṃ kriyate'rjuna|saṅgaṃ tyaktvā phalaṃ caiva sa tyāgaḥ sāttviko mataḥ||

हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है-इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है-वही सात्त्विक त्याग माना गया है।

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते

त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः

na dveṣṭyakuśalaṃ karma kuśale nānuṣajjate|tyāgī sattvasamāviṣṭo medhāvī chinnasaṃśayaḥ||

जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता-वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान् और सच्चा त्यागी है।

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः

यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते

na hi dehabhṛtā śakyaṃ tyaktuṃ karmāṇyaśeṣataḥ|yastu karmaphalatyāgī sa tyāgītyabhidhīyate||

क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्य के द्वारा सम्पूर्णता से सब कर्मों का त्याग किया जाना शक्य नहीं है; इसलिये जो कर्मफल का त्यागी है, वही त्यागी है—यही कहा जाता है।

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्

भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्

aniṣṭamiṣṭaṃ miśraṃ ca trividhaṃ karmaṇaḥ phalam|bhavatyatyāgināṃ pretya na tu saṃnyāsināṃ kvacit||

कर्म फल का त्याग न करने वाले मनुष्यों के कर्मों का तो अच्छा, बुरा और मिला हुआ—ऐसे तीन प्रकार का फल मरने के पश्चात् अवश्य होता है; किन्तु कर्मफल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों के कर्मों का फल किसी काल में भी नहीं होता।

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे

सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्

pañcaitāni mahābāho kāraṇāni nibodha me|sāṃkhye kṛtānte proktāni siddhaye sarvakarmaṇām||

हे महाबाहो! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के पाँच हेतु कर्मों का अन्त करने के लिये उपाय बतलाने वाले सांख्य-शास्त्र में कहे गये हैं, उनको तू मुझसे भलीभाँति जान।

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्

विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्

adhiṣṭhānaṃ tathā kartā karaṇaṃ ca pṛthagvidham|vividhāśca pṛthakceṣṭā daivaṃ caivātra pañcamam||

इस विषय में अर्थात् कर्मों की सिद्धि में अधिष्ठान और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के करण एवं नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव कहा गया है।

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः

न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः

śarīravāṅmanobhiryatkarma prārabhate naraḥ|nyāyyaṃ vā viparītaṃ vā pañcaite tasya hetavaḥ||

मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है—उसके ये पाँचों कारण हैं।

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः

पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः

tatraivaṃ sati kartāramātmānaṃ kevalaṃ tu yaḥ|paśyatyakṛtabuddhitvānna sa paśyati durmatiḥ||

परन्तु ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्धबुद्धि होने के कारण उस विषय में यानी कर्मों के होने में केवल—शुद्ध स्वरूप आत्मा को कर्ता समझता है, वह मलिन बुद्धिवाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता।

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते

हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते

yasya nāhaṃkṛto bhāvo buddhiryasya na lipyate|hatvāpi sa imā~llokānna hanti na nibadhyate||

जिस पुरुष के अन्तःकरण में 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और कर्मों में लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो मारता है और न पाप से बँधता है।

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना

करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः

jñānaṃ jñeyaṃ parijñātā trividhā karmacodanā|karaṇaṃ karma karteti trividhaḥ karmasaṃgrahaḥ||

ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय—यह तीन प्रकार की कर्म-प्रेरणा है और कर्ता,करण तथा क्रिया-यह तीन प्रकार का कर्म-संग्रह है।

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः

प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि

jñānaṃ karma ca kartā ca tridhaiva guṇabhedataḥ|procyate guṇasaṃkhyāne yathāvacchṛṇu tānyapi||

गुणों की संख्या करने वाले शास्त्र में ज्ञान और कर्म तथा कर्ता गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के ही कहे गये हैं, उनको भी तू मुझसे भलीभाँति सुन।

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते

अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्

sarvabhūteṣu yenaikaṃ bhāvamavyayamīkṣate|avibhaktaṃ vibhakteṣu tajjñānaṃ viddhi sāttvikam||

जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक्-पृथक् सब भूतों में एक अविनाशी परमात्म भाव-को विभागरहित समभाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तो तू सात्त्विक जान।

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्

वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्

pṛthaktvena tu yajjñānaṃ nānābhāvānpṛthagvidhān|vetti sarveṣu bhūteṣu tajjñānaṃ viddhi rājasam||

किन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को तू राजस जान।

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्

अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्

yattu kṛtsnavadekasminkārye saktamahaitukam|atattvārthavadalpaṃ ca tattāmasamudāhṛtam||

परन्तु जो ज्ञान एक कार्य रूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदृश आसक्त है; तथा उसे बिना युक्ति वाला, तात्त्विक अर्थ से रहित और तुच्छ है—वह तामस कहा गया है।

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्

अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते

niyataṃ saṅgarahitamarāgadveṣataḥ kṛtam|aphalaprepsunā karma yattatsāttvikamucyate||

जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित हो तथा फल न चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष के किया गया हो—वह सात्त्विक कहा जाता है।

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः

क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्

yattu kāmepsunā karma sāhaṅkāreṇa vā punaḥ|kriyate bahulāyāsaṃ tadrājasamudāhṛtam||

परन्तु जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त होता है तथा भोगों को चाहने वाले पुरुष द्वारा या अहंकार युक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है।

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्

मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते

anubandhaṃ kṣayaṃ hiṃsāmanapekṣya ca pauruṣam|mohādārabhyate karma yattattāmasamucyate||

जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचार कर केवल अज्ञान से आरम्भ किया जाता है—वह तामस कहा जाता है।

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः

सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते

muktasaṅgo'nahaṃvādī dhṛtyutsāhasamanvitaḥ|siddhyasiddhyornirvikāraḥ kartā sāttvika ucyate||

जो कर्ता संगरहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष-शोकादि विकारों से रहित है-वह सात्त्विक कहा जाता है।

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः

हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः

rāgī karmaphalaprepsurlubdho hiṃsātmako'śuciḥ|harṣaśokānvitaḥ kartā rājasaḥ parikīrtitaḥ||

जो कर्ता आसक्ति से युक्त, कर्मों के फल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाव वाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोक से लिप्त है-वह राजस कहा गया है।

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः

विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते

ayuktaḥ prākṛtaḥ stabdhaḥ śaṭho naiṣkṛtiko'lasaḥ|viṣādī dīrghasūtrī ca kartā tāmasa ucyate||

जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित, घमंडी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करने वाला तथा शोक करने वाला, आलसी और दीर्घसूत्री है—वह तामस कहा जाता है।

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु

प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय

buddherbhedaṃ dhṛteścaiva guṇatastrividhaṃ śrṛṇu|procyamānamaśeṣeṇa pṛthaktvena dhanañjaya||

हे धनंजय! अब तू बुद्धि का और धृति का भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णता से विभागपूर्वक कहा जाने वाला सुन।

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये

बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी

pravṛttiṃ ca nivṛttiṃ ca kāryākārye bhayābhaye|bandhaṃ mokṣaṃ ca yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī||

हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्ति मार्ग को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बन्धन और मोक्ष को यथार्थ जानती है-वह बुद्धि सात्त्विकी है।

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च

अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी

yayā dharmamadharmaṃ ca kāryaṃ cākāryameva ca|ayathāvatprajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī||

हे पार्थ! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता

सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी

adharmaṃ dharmamiti yā manyate tamasā''vṛtā|sarvārthānviparītāṃśca buddhiḥ sā pārtha tāmasī||

हे अर्जुन! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी 'यह धर्म है' ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य सम्पूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है।

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः

योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी

dhṛtyā yayā dhārayate manaḥprāṇendriyakriyāḥ|yogenāvyabhicāriṇyā dhṛtiḥ sā pārtha sāttvikī||

हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारण शक्ति से मनुष्य ध्यान योग के द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है।

यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन

प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी

yayā tu dharmakāmārthān dhṛtyā dhārayate'rjuna|prasaṅgena phalākāṅkṣī dhṛtiḥ sā pārtha rājasī||

हे पृथापुत्र! फल की इच्छा वाला मनुष्य जिस धारणशक्ति के द्वारा अत्यन्त आसक्ति से धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धारणशक्ति राजसी है।

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च

न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी

yayā svapnaṃ bhayaṃ śokaṃ viṣādaṃ madameva ca|na vimuñcati durmedhā dhṛtiḥ sā pārtha tāmasī||

हे पार्थ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस. धारणशक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता और दुःख को तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता अर्थात् धारण किये रहता है—वह धारणशक्ति तामसी है।

सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ

अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति

sukhaṃ tvidānīṃ trividhaṃ śrṛṇu me bharatarṣabha|abhyāsādramate yatra duḥkhāntaṃ ca nigacchati||

हे भरत श्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अन्त को प्राप्त हो जाता है—॥ ३६॥ जो ऐसा सुख है, वह आरम्भकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है; इसलिये वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है।

श्लोक 36–37

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्

तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्

yattadagre viṣamiva pariṇāme'mṛtopamam|tatsukhaṃ sāttvikaṃ proktamātmabuddhiprasādajam||

हे भरत श्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अन्त को प्राप्त हो जाता है—॥ ३६॥ जो ऐसा सुख है, वह आरम्भकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है; इसलिये वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है।

श्लोक 36–37

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्

परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्

viṣayendriyasaṃyogādyattadagre'mṛtopamam|pariṇāme viṣamiva tatsukhaṃ rājasaṃ smṛtam||

जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से होता है, वह पहले—भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य है; इसलिये वह सुख राजस कहा गया है।

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः

निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्

yadagre cānubandhe ca sukhaṃ mohanamātmanaḥ|nidrālasyapramādotthaṃ tattāmasamudāhṛtam||

जो सुख भोग काल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है—वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है।

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः

सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः

na tadasti pṛthivyāṃ vā divi deveṣu vā punaḥ|sattvaṃ prakṛtijairmuktaṃ yadebhiḥ syāttribhirguṇaiḥ||

पृथ्वी में या आकाश में अथवा देवताओं में तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो।

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप

कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः

brāhmaṇakṣatriyaviśāṃ śūdrāṇāṃ ca paraṃtapa|karmāṇi pravibhaktāni svabhāvaprabhavairguṇaiḥ||

हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों के द्वारा विभक्त किये गये हैं।

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्

śamo damastapaḥ śaucaṃ kṣāntirārjavameva ca|jñānaṃ vijñānamāstikyaṃ brahmakarma svabhāvajam||

अन्तकरण का निग्रह करना; इन्द्रियों का दमन करना; धर्मपालन के लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना; मन, इन्द्रिय और शरीर को सरल रखना; वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना; वेद शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना—ये सब-के-सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्

दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्

śauryaṃ tejo dhṛtirdākṣyaṃ yuddhe cāpyapalāyanam|dānamīśvarabhāvaśca kṣātraṃ karma svabhāvajam||

शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव—ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्

परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्

kṛṣigaurakṣyavāṇijyaṃ vaiśyakarma svabhāvajam|paricaryātmakaṃ karma śūdrasyāpi svabhāvajam||

खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार—ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं। तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है।

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः

स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṃsiddhiṃ labhate naraḥ|svakarmanirataḥ siddhiṃ yathā vindati tacchṛṇu||

अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परम सिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन।

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः

yataḥ pravṛttirbhūtānāṃ yena sarvamidaṃ tatam|svakarmaṇā tamabhyarcya siddhiṃ vindati mānavaḥ||

जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है।

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्

स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्

śreyānsvadharmo viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt|svabhāvaniyataṃ karma kurvannāpnoti kilbiṣam||

अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किये हुए स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता।

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्

सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः

sahajaṃ karma kaunteya sadoṣamapi na tyajet|sarvārambhā hi doṣeṇa dhūmenāgnirivāvṛtāḥ||

अतएव हे कुन्ती पुत्र! दोष युक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिये, क्योंकि धूएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से आवृत हैं।

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः

नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति

asaktabuddhiḥ sarvatra jitātmā vigataspṛhaḥ|naiṣkarmyasiddhiṃ paramāṃ saṃnyāsenādhigacchati||

सर्वत्र आसक्ति रहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अन्तःकरण वाला पुरुष सांख्ययोग के द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है।

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे

समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा

siddhiṃ prāpto yathā brahma tathāpnoti nibodha me|samāsenaiva kaunteya niṣṭhā jñānasya yā parā||

जो कि ज्ञानयोग की परानिष्ठा है, उस नैष्कर्म्य सिद्धि को जिस प्रकार से प्राप्त होकर मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त होता है, उस प्रकार को हे कुन्ती पुत्र! तू संक्षेप में ही मुझसे समझ।

बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च

शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च

buddhyā viśuddhayā yukto dhṛtyā''tmānaṃ niyamya ca|śabdādīn viṣayāṃstyaktvā rāgadveṣau vyudasya ca||

विशुद्ध बुद्धि से युक्त तथा हल्का, सात्त्विक और नियमित भोजन करने वाला, शब्दादि विषयों का त्याग करके एकान्त और शुद्ध देश का सेवन करने वाला, सात्त्विक धारणशक्ति के द्वारा अन्तःकरण और इन्द्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला, राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके भलीभाँति दृढ़ वैराग्य का आश्रय लेने वाला तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरन्तर ध्यान योग के परायण रहने वाला ममता रहित और शान्ति युक्त पुरुष सच्चिदानन्द ब्रह्म में अभिन्न भाव से स्थित होने का पात्र होता है।

श्लोक 51–53

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः

ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः

viviktasevī laghvāśī yatavākkāyamānasaḥ|dhyānayogaparo nityaṃ vairāgyaṃ samupāśritaḥ||

विशुद्ध बुद्धि से युक्त तथा हल्का, सात्त्विक और नियमित भोजन करने वाला, शब्दादि विषयों का त्याग करके एकान्त और शुद्ध देश का सेवन करने वाला, सात्त्विक धारणशक्ति के द्वारा अन्तःकरण और इन्द्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला, राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके भलीभाँति दृढ़ वैराग्य का आश्रय लेने वाला तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरन्तर ध्यान योग के परायण रहने वाला ममता रहित और शान्ति युक्त पुरुष सच्चिदानन्द ब्रह्म में अभिन्न भाव से स्थित होने का पात्र होता है।

श्लोक 51–53

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्

विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते

ahaṅkāraṃ balaṃ darpaṃ kāmaṃ krodhaṃ parigraham|vimucya nirmamaḥ śānto brahmabhūyāya kalpate||

विशुद्ध बुद्धि से युक्त तथा हल्का, सात्त्विक और नियमित भोजन करने वाला, शब्दादि विषयों का त्याग करके एकान्त और शुद्ध देश का सेवन करने वाला, सात्त्विक धारणशक्ति के द्वारा अन्तःकरण और इन्द्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला, राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके भलीभाँति दृढ़ वैराग्य का आश्रय लेने वाला तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरन्तर ध्यान योग के परायण रहने वाला ममता रहित और शान्ति युक्त पुरुष सच्चिदानन्द ब्रह्म में अभिन्न भाव से स्थित होने का पात्र होता है।

श्लोक 51–53

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति

समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्

brahmabhūtaḥ prasannātmā na śocati na kāṅkṣati|samaḥ sarveṣu bhūteṣu madbhaktiṃ labhate parām||

फिर वह सच्चिदानन्दधन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसी के लिये शोक करता है और न किसी की आकाङ्क्षा ही करता है। ऐसा समस्त प्राणियों में समभाव वाला योगी मेरी परा भक्ति को प्राप्त हो जाता है।

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्

bhaktyā māmabhijānāti yāvānyaścāsmi tattvataḥ|tato māṃ tattvato jñātvā viśate tadanantaram||

उस पर भक्ति के द्वारा वह मुझ परमात्मा को, मैं जो हूँ और जितना हूँ ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्व से जान लेता है; तथा उस भक्ति से मुझ को तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है।

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः

मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्

sarvakarmāṇyapi sadā kurvāṇo madvyapāśrayaḥ|matprasādādavāpnoti śāśvataṃ padamavyayam||

मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो सम्पूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है।

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः

बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव

cetasā sarvakarmāṇi mayi saṃnyasya matparaḥ|buddhiyogamupāśritya maccittaḥ satataṃ bhava||

सब कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके तथा समबुद्धि रूप योग को अवलम्बन करके मेरे परायण और निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो।

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि

अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि

maccittaḥ sarvadurgāṇi matprasādāttariṣyasi|atha cettvamahaṅkārānna śroṣyasi vinaṅkṣyasi||

उपर्युक्त प्रकार से मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जायेगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जायेगा अर्थात् परमार्थ से भ्रष्ट हो जायेगा।

यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे

मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति

yadahaṅkāramāśritya na yotsya iti manyase|mithyaiṣa vyavasāyaste prakṛtistvāṃ niyokṣyati||

जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि 'मैं युद्ध नहीं करूंगा', तेरा यह निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबरदस्ती युद्ध में लगा देगा।

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा

कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्

svabhāvajena kaunteya nibaddhaḥ svena karmaṇā|kartuṃ necchasi yanmohātkariṣyasyavaśo'pi tat||

हे कुन्ती पुत्र! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ परवश होकर करेगा।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया

īśvaraḥ sarvabhūtānāṃ hṛddeśe'rjuna tiṣṭhati|bhrāmayansarvabhūtāni yantrārūḍhāni māyayā||

हे अर्जुन! शरीर-रूप यन्त्र में आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है।

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्

tameva śaraṇaṃ gaccha sarvabhāvena bhārata|tatprasādātparāṃ śāntiṃ sthānaṃ prāpsyasi śāśvatam||

हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शान्ति को तथा सनातन परम धाम को प्राप्त होगा।

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया

विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु

iti te jñānamākhyātaṃ guhyādguhyataraṃ mayā|vimṛśyaitadaśeṣeṇa yathecchasi tathā kuru||

इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुझसे कह दिया। अब तू इस रहस्य युक्त ज्ञान को पूर्णतया भलीभाँति विचार कर, जैसे चाहता है वैसे ही कर।

सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः

इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्

sarvaguhyatamaṃ bhūyaḥ śrṛṇu me paramaṃ vacaḥ|iṣṭo'si me dṛḍhamiti tato vakṣyāmi te hitam||

सम्पूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्य युक्त वचन को तू फिर भी सुन। तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु

मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे

manmanā bhava madbhakto madyājī māṃ namaskuru|māmevaiṣyasi satyaṃ te pratijāne priyo'si me||

हे अर्जुन! तू मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः

sarvadharmānparityajya māmekaṃ śaraṇaṃ vraja|ahaṃ tvā sarvapāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ||

सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्याग कर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन

न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति

idaṃ te nātapaskāya nābhaktāya kadācana|na cāśuśrūṣave vācyaṃ na ca māṃ yo'bhyasūyati||

तुझे यह गीता रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिये, न भक्तिरहित और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिये; तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है उससे भी नहीं कहना चाहिये।

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति

भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः

ya imaṃ paramaṃ guhyaṃ madbhakteṣvabhidhāsyati|bhaktiṃ mayi parāṃ kṛtvā māmevaiṣyatyasaṃśayaḥ||

जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा—इसमें कोई सन्देह नहीं है।

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः

भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि

na ca tasmānmanuṣyeṣu kaścinme priyakṛttamaḥ|bhavitā na ca me tasmādanyaḥ priyataro bhuvi||

उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है; तथा पृथ्वी भर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं।

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः

ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः

adhyeṣyate ca ya imaṃ dharmyaṃ saṃvādamāvayoḥ|jñānayajñena tenāhamiṣṭaḥ syāmiti me matiḥ||

जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद रूप गीताशास्त्र को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा-ऐसा मेरा मत है।

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः

सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्

śraddhāvānanasūyaśca śrṛṇuyādapi yo naraḥ|so'pi muktaḥ śubhā~llokānprāpnuyātpuṇyakarmaṇām||

जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा।

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा

कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय

kaccidetacchrutaṃ pārtha tvayaikāgreṇa cetasā|kaccidajñānasaṃmohaḥ pranaṣṭaste dhanañjaya||

हे पार्थ! क्या इस (गीताशास्त्र) को तूने एकाग्रचित्त से श्रवण किया? और हे धनंजय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?

अर्जुन उवाचनष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत

स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव

arjuna uvācanaṣṭo mohaḥ smṛtirlabdhā tvatprasādānmayācyuta|sthito'smi gatasandehaḥ kariṣye vacanaṃ tava||

अर्जुन बोले—हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थित हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।

सञ्जय उवाचइत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः

संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्

sañjaya uvācaityahaṃ vāsudevasya pārthasya ca mahātmanaḥ|saṃvādamimamaśrauṣamadbhutaṃ romaharṣaṇam||

सञ्जय बोले—इस प्रकार मैंने श्रीवासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत रहस्ययुक्त, रोमाञ्चकारक संवाद को सुना।

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्

योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्

vyāsaprasādācchrutavānetadguhyamahaṃ param|yogaṃ yogeśvarātkṛṣṇātsākṣātkathayataḥ svayam||

श्रीव्यासजी की कृपा से दिव्य दृष्टि पाकर मैंने इस परम गोपनीय योग के अर्जुन के प्रति कहते हुए स्वयं योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष सुना है।

राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्

केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः

rājansaṃsmṛtya saṃsmṛtya saṃvādamimamadbhutam|keśavārjunayoḥ puṇyaṃ hṛṣyāmi ca muhurmuhuḥ||

हे राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस रहस्ययुक्त, कल्याणकारक और अद्भुत संवाद को पुनः-पुनः स्मरण करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः

विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः

tacca saṃsmṛtya saṃsmṛtya rūpamatyadbhutaṃ hareḥ|

vismayo me mahān rājan hṛṣyāmi ca punaḥ punaḥ||

हे राजन्! श्रीहरि के उस अत्यन्त विलक्षण रूप को पुनः-पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान् आश्चर्य होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम

yatra yogeśvaraḥ kṛṣṇo yatra pārtho dhanurdharaḥ|

tatra śrīrvijayo bhūtirdhruvā nītirmatirmama||

हे राजन्! जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन हैं, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है—ऐसा मेरा मत है।

अध्याय दीया: unlit

भगवद्गीता का अध्याय 18 यहाँ समाप्त होता है —

मोक्ष सन्न्यास योग

Mokṣa Sannyāsa Yoga · मोक्षसंन्यासयोग

॥ ॐ तत्सत् ॥

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