अध्याय 14 · प्रवाह में पढ़ें

गुणत्रय विभाग योग

Guṇatraya Vibhāga Yoga · गुणत्रयविभागयोग

श्री भगवानुवाचपरं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्

यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः

śrī bhagavānuvācaparaṃ bhūyaḥ pravakṣyāmi jñānānāṃ jñānamuttamam|yajjñātvā munayaḥ sarve parāṃ siddhimito gatāḥ||

श्रीभगवान् बोले-ज्ञानों में भी अति उत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गये हैं।

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः

सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च

idaṃ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ|sarge'pi nopajāyante pralaye na vyathanti ca||

इस ज्ञान को आश्रय करके अर्थात् धारण करके मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकाल में भी व्याकुल नहीं होते।

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्

संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत

mama yonirmahadbrahma tasmin garbhaṃ dadhāmyaham|saṃbhavaḥ sarvabhūtānāṃ tato bhavati bhārata||

हे अर्जुन! मेरी महत्-ब्रह्म रूप मूल प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है अर्थात् गर्भाधान का स्थान है और मैं उस योनि में चेतन-समुदाय रूप गर्भ को स्थापन करता हूँ। उस जड़-चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पत्ति होती है।

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः

तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता

sarvayoniṣu kaunteya mūrtayaḥ sambhavanti yāḥ|tāsāṃ brahma mahadyonirahaṃ bījapradaḥ pitā||

हे अर्जुन! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियाँ अर्थात् शरीर धारी प्राणी उत्पन्न होते हैं, प्रकृति तो उन सबकी गर्भ धारण करने वाली माता है और मैं बीज को स्थापन करने वाला पिता हूँ।

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्

sattvaṃ rajastama iti guṇāḥ prakṛtisaṃbhavāḥ|nibadhnanti mahābāho dehe dehinamavyayam||

हे अर्जुन! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण-ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं।

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्

सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ

tatra sattvaṃ nirmalatvātprakāśakamanāmayam|sukhasaṅgena badhnāti jñānasaṅgena cānagha||

हे निष्पाप! उन तीनों गुणों में सत्त्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है, वह सुख के संबंध से और ज्ञान के संबंध से अर्थात् उसके अभिमान से बाँधता है।

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्

तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्

rajo rāgātmakaṃ viddhi tṛṣṇāsaṅgasamudbhavam|tannibadhnāti kaunteya karmasaṅgena dehinam||

हे अर्जुन! राग रूप रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को कर्मों के और उनके फल के संबंध से बाँधता है।

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्

प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत

tamastvajñānajaṃ viddhi mohanaṃ sarvadehinām|pramādālasyanidrābhistannibadhnāti bhārata||

हे अर्जुन! सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तो अज्ञान से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा बाँधता है।

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत

ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत

sattvaṃ sukhe sañjayati rajaḥ karmaṇi bhārata|jñānamāvṛtya tu tamaḥ pramāde sañjayatyuta||

हे अर्जुन! सत्त्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में। तथा तमोगुण तो ज्ञान को ढककर प्रमाद में भी लगाता है।

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत

रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा

rajastamaścābhibhūya sattvaṃ bhavati bhārata|rajaḥ sattvaṃ tamaścaiva tamaḥ sattvaṃ rajastathā||

हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण होता है और सत्त्वगुण तथा तमोगुण को दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण होता है अर्थात् बढ़ता है।

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते

ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत

sarvadvāreṣu dehe'sminprakāśa upajāyate|jñānaṃ yadā tadā vidyādvivṛddhaṃ sattvamityuta||

जिस समय इस देह में तथा अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतनता और विवेकशक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा है।

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा

रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ

lobhaḥ pravṛttirārambhaḥ karmaṇāmaśamaḥ spṛhā|rajasyetāni jāyante vivṛddhe bharatarṣabha||

हे अर्जुन! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ प्रवृत्ति, स्वार्थ बुद्धि से कर्मों का सकाम भाव से आरम्भ, अशान्ति और विषय भोगों की लालसा-ये सब उत्पन्न होते हैं।

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च

तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन

aprakāśo'pravṛttiśca pramādo moha eva ca|tamasyetāni jāyante vivṛddhe kurunandana||

हे अर्जुन! तमोगुण के बढ़ने पर अन्तःकरण और इन्द्रियों में अप्रकाश, कर्तव्य-कर्मों में अप्रवृत्ति और प्रमाद अर्थात् व्यर्थ चेष्टा और निद्रादि अन्तःकरण की मोहिनी वृत्तियाँ—ये सब ही उत्पन्न होते हैं।

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्

तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते

yadā sattve pravṛddhe tu pralayaṃ yāti dehabhṛt|tadottamavidāṃ lokānamalānpratipadyate||

जब यह मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है।

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते

तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते

rajasi pralayaṃ gatvā karmasaṅgiṣu jāyate|tathā pralīnastamasi mūḍhayoniṣu jāyate||

रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है; तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ मनुष्य कीट, पशु आदि मूढयोनियों में उत्पन्न होता है।

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्

रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्

karmaṇaḥ sukṛtasyāhuḥ sāttvikaṃ nirmalaṃ phalam|rajasastu phalaṃ duḥkhamajñānaṃ tamasaḥ phalam||

श्रेष्ठ कर्म का तो सात्त्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है; राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है।

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च

प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च

sattvātsañjāyate jñānaṃ rajaso lobha eva ca|pramādamohau tamaso bhavato'jñānameva ca||

सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुण से निस्सन्देह लोभ; तथा तमोगुण से प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं और अज्ञान भी होता है।

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः

जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः

ūrdhvaṃ gacchanti sattvasthā madhye tiṣṭhanti rājasāḥ|jaghanyaguṇavṛttisthā adho gacchanti tāmasāḥ||

सत्त्वगुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते हैं, रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में अर्थात् मनुष्यलोक में ही रहते हैं और तमोगुण के कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादि में स्थित तामस पुरुष अधोगति को अर्थात् कीट, पशु आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते हैं।

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति

गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति

nānyaṃ guṇebhyaḥ kartāraṃ yadā draṣṭānupaśyati|guṇebhyaśca paraṃ vetti madbhāvaṃ so'dhigacchati||

जिस समय द्रष्टा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यन्त परे सच्चिदानन्दधन स्वरूप मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानता है, उस समय वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्

जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते

guṇānetānatītya trīndehī dehasamudbhavān|janmamṛtyujarāduḥkhairvimukto'mṛtamaśnute||

यह पुरुष शरीर की उत्पत्ति के कारण रूप इन तीनों गुणों को उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है।

अर्जुन उवाचकैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो

किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते

arjuna uvācakairliṃgaistrīnguṇānetānatīto bhavati prabho|kimācāraḥ kathaṃ caitāṃstrīnguṇānativartate||

अर्जुन बोले—इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन-किन लक्षणों से युक्त होता है और किस प्रकार के आचरणों वाला होता है; तथा हे प्रभो! मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है।

श्री भगवानुवाचप्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव

न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति

śrī bhagavānuvācaprakāśaṃ ca pravṛttiṃ ca mohameva ca pāṇḍava|na dveṣṭi sampravṛttāni na nivṛttāni kāṅkṣati||

श्रीभगवान् बोले—हे अर्जुन! जो पुरुष सत्त्वगुण के कार्यरूप प्रकाश को और रजोगुण के कार्यरूप प्रवृत्ति को तथा तमोगुण के कार्यरूप मोहको भी न तो प्रवृत्त होने पर उनसे द्वेष करता है और न निवृत्त होने पर उनकी आकाङ्क्षा करता है।

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते

गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते

udāsīnavadāsīno guṇairyo na vicālyate|guṇā vartanta ityeva yo'vatiṣṭhati neṅgate||

जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता और गुण ही गुणों में बरतते हैं—ऐसा समझता हुआ जो सच्चिदानन्दधन परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहता है एवं उस स्थिति से कभी विचलित नहीं होता।

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः

तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः

samaduḥkhasukhaḥ svasthaḥ samaloṣṭāśmakāñcanaḥ|tulyapriyāpriyo dhīrastulyanindātmasaṃstutiḥ||

जो निरन्तर आत्मभाव में स्थित, दुःख-सुख को समान समझने वाला, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समान भाव वाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-सा मानने वाला और अपनी निन्दा-स्तुति में भी समान भाव वाला है।

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः

सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते

mānāpamānayostulyastulyo mitrāripakṣayoḥ|sarvārambhaparityāgī guṇātītaḥ sa ucyate||

जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता है।

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते

स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते

māṃ ca yo'vyabhicāreṇa bhaktiyogena sevate|sa guṇānsamatītyaitān brahmabhūyāya kalpate||

जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति योग के द्वारा मुझ को निरन्तर भजता है, वह भी इन तीनों गुणों को भलीभाँति लाँघकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त होने के लिये योग्य बन जाता है।

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च

शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च

brahmaṇo hi pratiṣṭhā'hamamṛtasyāvyayasya ca|śāśvatasya ca dharmasya sukhasyaikāntikasya ca||

क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म का और अमृत का तथा नित्य धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का आश्रय मैं हूँ इसलिए इनका मैं परम आश्रय हूँ।

अध्याय दीया: unlit

भगवद्गीता का अध्याय 14 यहाँ समाप्त होता है —

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